छत्तीसगढ़ी भाषा अर्धमागधी की दुहिता एवं अवधी की सहोदरा - डॉ अर्चना पाठक

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रायपुर। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘नवां प्रांतीय सम्मेलन’ (नवम अधिवेशन) दिनांक 10 और 11 जनवरी को सिम्स ऑडिटोरियम में नवां प्रांतीय सम्मेलन संपन्न हुआ।
     कार्यक्रम में प्रतिभाग कर लौटीं सरगुजा की वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अर्चना पाठक, सहायक प्राध्यापक डाइट रायपुर ने बताया कि ऐसे आयोजन जहाँ सीखने के लिए पाठशाला है तो वहीं विविधताओं को समेटे यह किसी अनुसंधान से कम नहीं।
     प्रसिद्ध विद्वान प्यारेलाल गुप्त के पुस्तक “प्राचीन छत्तीसगढ़” का उल्लेख करते हुए अर्चना पाठक ने बताया कि “छत्तीसगढ़ी भाषा अर्धमागधी की दुहिता एवं अवधी की सहोदरा है” यह उद्धरण छत्तीसगढ़ी की प्राचीनता और समृद्धि को रेखांकित करता है, जो आज भी हमारी सांस्कृतिक पहचान की मजबूत नींव है।
    ऐसे आयोजन छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों के लिए विशिष्ट मंच है जहाँ आयोग से प्रकाशित 13 पुस्तकों का विमोचन हुआ तथा साहित्यकारों को सम्मानित किया गया।
    इस गरिमामयी आयोजन में प्रदेश के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल कार्यक्रम अध्यक्ष के रूप में शामिल हुए। सम्मेलन में उन्होंने कहा कि दैनिक जीवन में छत्तीसगढ़ी का प्रयोग होना चाहिए। कहा कि प्रदेश वासियों को चाहिए कि वे अपने दैनिक जीवन में जितना इस भाषा का प्रयोग करेंगे हमारी छत्तीसगढ़ी उतनी ही संवर्धित होगी।
     विभिन्न सत्रों में पूरे प्रदेश से आए कवियों को अपनी रचनाएं प्रस्तुत करने का अवसर मिला। इस अवसर पर डॉक्टर अर्चना पाठक ने सुमधुर  कंठ से अपनी रचना
मोला बोलावत हे पहार मैं तो जाहूँ गा, उजर पानी हरियर धरती संघे सुस्ताहूँ गा,
की प्रस्तुति दी।
      कहा कि प्रदेश वासियों को चाहिए कि वे अपने दैनिक जीवन में जितना इस भाषा का प्रयोग करेंगे हमारी छत्तीसगढ़ी उतनी ही संवर्धित होगी।
     कार्यक्रम में डॉ सुधीर पाठक, समन्वयक राजेश तिवारी, माधुरी जायसवाल, मंशा शुक्ला, राजलक्ष्मी पाण्डेय, पूनम दुबे वीणा, भारती यादव सुमन शर्मा बाजपेयी, संध्या रानी शुक्ला, सुषमा पटेल, पल्लवी झा रुमा ,सीमा निगम सहित लगभग सात सौ से ज्यादा छत्तीसगढ़ी साहित्यकार उपस्थित रहे।

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