आर्या परियोजना के अंतर्गत मधुमक्खी पालन पर सात दिवसीय प्रशिक्षण का शुभारंभ

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मधुमक्खी पालन कम लागत में अधिक लाभ देने वाला उद्यम -डॉ. पीके मिश्रा

बस्ती। आचार्य नरेंद्र कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या द्वारा संचालित एवं वित्त पोषित- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी) कानपुर के कृषि विज्ञान केंद्र बस्ती द्वारा आर्या परियोजना के अंतर्गत मधुमक्खी पालन पर सात दिवसीय प्रशिक्षण का शुभारंभ भारत सरकार की महत्वाकांक्षी आर्या (ARYA – Attracting and Retaining Youth in Agriculture) परियोजना के अंतर्गत युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से मधुमक्खी पालन विषय पर सात दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ आज कृषि विज्ञान केंद्र बस्ती पर किया गया।

 प्रशिक्षण के प्रथम दिन कार्यक्रम का उद्घाटन कृषि विज्ञान केंद्र बस्ती के प्रभारी अधिकारी डॉ. पीके मिश्रा ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि मधुमक्खी पालन कम लागत में अधिक लाभ देने वाला उद्यम है, जिससे ग्रामीण युवाओं की आय में वृद्धि के साथ-साथ परागण के माध्यम से फसलों की उत्पादकता भी बढ़ती है। आर्या परियोजना का मुख्य उद्देश्य युवाओं को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है।  साथ ही साथ प्रशिक्षण सत्र के दौरान मधुमक्खी पालन की मूल अवधारणा, मधुमक्खियों की प्रजातियाँ, छत्ता प्रबंधन, मधुमक्खियों का जीवन चक्र, शहद उत्पादन की संभावनाएँ तथा मधुमक्खी पालन से जुड़ी आय-वृद्धि के अवसरों पर विस्तृत जानकारी दी गई। साथ ही प्रतिभागियों को यह भी बताया गया कि मधुमक्खी पालन को अन्य कृषि एवं बागवानी फसलों के साथ जोड़कर किस प्रकार अतिरिक्त लाभ प्राप्त किया जा सकता है। प्रशिक्षण के कोर्स कोआर्डिनेटर एवं केंद्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. प्रेम शंकर ने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण के दौरान मधुमक्खी प्रजातियों की पहचान, कॉलोनी प्रबंधन, रोग-कीट नियंत्रण, शहद निष्कर्षण एवं विपणन से संबंधित विषयों को गंभीरता से सीखने का आह्वान किया। साथ ही, उन्होंने आश्वस्त किया कि प्रशिक्षण के पश्चात भी तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाएगा।
    केंद्र के पादप प्रजनन एवं आनुवांशिकी वैज्ञानिक डॉ. वीबी  सिंह ने प्रशिक्षण के दौरान बताया कि मधुमक्खियाँ प्रकृति की अद्भुत देन हैं। इनके द्वारा किया गया परागण फसलों, फल-सब्जियों एवं तिलहनों की उपज और गुणवत्ता में 20-30 प्रतिशत तक वृद्धि कर सकता है। इससे न केवल परिवार की आय बढ़ती है, बल्कि क्षेत्र की कृषि उत्पादकता भी  सुदृढ़ होती है। केंद्र की गृह विज्ञान वैज्ञानिक डॉ अंजलि वर्मा ने अपने संबोधन में बताया कि मधुमक्खी पालन (बी-कीपिंग) न केवल पोषण सुरक्षा को बढ़ावा देता है, बल्कि आय सृजन का एक सरल, कम लागत वाला और पर्यावरण -अनुकूल माध्यम भी है। शहद एक पोषक एवं औषधीय खाद्य पदार्थ है, जो बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए अत्यंत लाभकारी है।
    शहद, मोम, परागकण एवं रॉयल जेली जैसे उत्पादों से घरेलू स्तर पर मूल्य संवर्धन कर महिलाएँ आत्मनिर्भर बन सकती हैं। यह कार्य घर के आस-पास किया जा सकता है, जिससे महिलाओं को समय, श्रम और संसाधनों की बचत होती है। प्रशिक्षण में जिले के विभिन्न विकास खंडों से 25 चयनित युवा कृषक एवं ग्रामीण युवक-युवतियाँ प्रतिभाग कर रहे हैं। प्रथम दिन प्रशिक्षण के दौरान शस्य विज्ञान वैज्ञानिक हरिओम मिश्रा ने सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ आगामी दिनों में होने वाले प्रायोगिक प्रशिक्षण की रूपरेखा भी प्रतिभागियों के समक्ष रखी।
    कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों के प्रश्नों का समाधान किया गया तथा उन्हें नियमित रूप से प्रशिक्षण में उपस्थित रहने एवं सीखी गई तकनीकों को व्यवहार में अपनाने हेतु प्रेरित किया गया। कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा यह आशा व्यक्त की गई कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम युवाओं के लिए स्वरोजगार का सशक्त माध्यम सिद्ध होगा और जिले में मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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