कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती द्वारा मशरूम उत्पादन तकनीक विषय पर रोजगारपरक प्रशिक्षण

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ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने और युवाओं, किसानों तथा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती  का सराहनीय एवं दूरदर्शी पहल- डॉ राज मंगल चौधरी
मशरूम उत्पादन आज के समय में कम पूंजी, कम स्थान और कम समय में अधिक लाभ देने वाला अत्यंत संभावनाशील उद्यम -डॉ पी के मिश्रा

बस्ती। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या उत्तर प्रदेश द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र बस्ती पर मशरूम उत्पादन तकनीक पर पांच दिवसीय (दिनांक 5 से 9 जनवरी 2026) रोजगारपरक प्रशिक्षण के अंतिम दिन जनपद के भूमि संरक्षण अधिकारी डॉ राज मंगल चौधरी ने प्रशिक्षणर्थियों को संबोधित करते कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने और युवाओं, किसानों तथा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती द्वारा एक सराहनीय एवं दूरदर्शी पहल करते हुए “मशरूम उत्पादन तकनीक” विषय पर रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जिसमें जनपद के विभिन्न विकास खण्डों के 25 प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया। यह प्रशिक्षण न केवल आयवर्धन का माध्यम है, बल्कि पोषण सुरक्षा एवं सतत कृषि की ओर एक मजबूत कदम भी है।
      इस अवसर पर केंद्र के प्रभारी अधिकारी डॉ पी के मिश्रा ने बताया कि मशरूम उत्पादन आज के समय में कम पूंजी, कम स्थान और कम समय में अधिक लाभ देने वाला अत्यंत संभावनाशील उद्यम है। बदलती खान-पान की आदतों और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण मशरूम की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे यह स्वरोजगार का सशक्त साधन बन चुका है।

    जनपद के 14 विकास खंडों मैं मशरूम उत्पादन की खेती दिनों दिन बढ़ती जा रही है जिसमें हर्रैया कप्तानगंज बस्ती सदर दुबौलिया ब्लाक हब के रूप में मशरूम की खेती में अग्रसर है। निस्संदेह, यह प्रशिक्षण कार्यक्रम ग्रामीण विकास, स्वरोजगार और आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में एक प्रेरक उदाहरण है। प्रशिक्षण के कोर्स कोआर्डिनेटर/ पौध सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ प्रेम शंकर ने अपने संबोधन में प्रतिभागियों को मार्गदर्शन देते हुए कहा कि मशरूम उत्पादन एक अत्यंत संवेदनशील लेकिन लाभकारी उद्यम है, जिसमें स्वच्छता, रोग प्रबंधन एवं वैज्ञानिक सावधानियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
     उन्होंने बताया कि मशरूम उत्पादन में रोग एवं कीटों की रोकथाम ही सफलता की कुंजी है। यदि प्रारंभ से ही स्वच्छ वातावरण, शुद्ध स्पॉन तथा उचित तापमान और नमी का ध्यान रखा जाए, तो उत्पादन में होने वाली हानि को काफी हद तक रोका जा सकता है। उन्होंने विशेष रूप से ग्रीन मोल्ड, ब्लैक मोल्ड, बैक्टीरियल ब्लॉच जैसी प्रमुख बीमारियों की पहचान, कारण एवं नियंत्रण के बारे में सरल भाषा में विस्तार से जानकारी दी। इन्होंने जोर देते हुए कहा कि रासायनिक दवाओं के अनावश्यक प्रयोग से बचना चाहिए और अधिक से अधिक स्वच्छता आधारित एवं जैविक उपायों को अपनाना चाहिए। उत्पादन कक्ष की नियमित सफाई, औजारों का कीटाणुशोधन, संक्रमित बेड को तुरंत अलग करना तथा साफ पानी का प्रयोगकृये सभी उपाय रोग प्रबंधन में अत्यंत सहायक हैं।
    प्रशिक्षण कार्यक्रम में पादप प्रजनन एवं अनुवांशिकी वैज्ञानिक डॉ वी बी सिंह ने अपने संबोधन में बताया कि मशरूम उत्पादन की सफलता का आधार उन्नत एवं शुद्ध किस्मों के स्पॉन का चयन है। गुणवत्तायुक्त स्पॉन से न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि रोगों की संभावना भी कम होती है।
    उन्होंने वैज्ञानिक विधि से तैयार स्पॉन के उपयोग, उपयुक्त प्रजाति के चयन तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार मशरूम उत्पादन अपनाने पर जोर दिया। अंत में उन्होंने प्रतिभागियों को सलाह दी कि प्रमाणित स्रोत से ही स्पॉन प्राप्त करें, जिससे बेहतर गुणवत्ता एवं अधिक लाभ सुनिश्चित किया जा सके।  मशरूम उत्पादन तकनीक को अपनाकर ग्रामीण युवाओं, महिलाओं एवं किसानों के लिए स्वरोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं। उन्होंने प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान को व्यवहार में उतारने तथा अन्य किसानों तक पहुँचाने पर विशेष बल दिया।
    उन्होंने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा तकनीकी मार्गदर्शन, परामर्श एवं विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़कर उद्यम स्थापना में सहयोग किया जाएगा। अंत में उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि समूह बनाकर कार्य करें, बाजार से जुड़ें और मशरूम उत्पादन को सफल ग्रामीण उद्यम के रूप में विकसित करें। केंद्र की गृह विज्ञान वैज्ञानिक डॉ अंजलि वर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि मशरूम न केवल आयवर्धन का सशक्त साधन है, बल्कि यह पोषण सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। मशरूम प्रोटीन, विटामिन एवं खनिज तत्वों से भरपूर होता है, जो संतुलित आहार में सहायक है।
उन्होंने बताया कि मशरूम का प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं घरेलू स्तर पर व्यंजन निर्माण कर महिलाएं एवं स्वयं सहायता समूह अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं। अंत में उन्होंने प्रतिभागियों को मशरूम उत्पादन को घरेलू उद्यम एवं स्वरोजगार के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया।
    प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान शस्य वैज्ञानिक हरिओम मिश्रा ने अपने संबोधन में कहा कि मशरूम उत्पादन फसल विविधीकरण का एक प्रभावी माध्यम है, जिससे किसानों की आय में स्थिरता आती है। उन्होंने बताया कि धान का पुआल, गेहूं का भूसा जैसे कृषि अपशिष्टों का उपयोग कर कम लागत में मशरूम उत्पादन किया जा सकता है।
उन्होंने उत्पादन चक्र, समय प्रबंधन एवं निरंतर उत्पादन की रणनीति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वैज्ञानिक विधि अपनाकर वर्ष भर मशरूम उत्पादन संभव है। प्रशिक्षण उपरांत प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र एवं फल सब्जी पौध का वितरण अतिथियों द्वारा किया गया।

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